किसान की न आमदनी बढ़ी, न लागत घटी। आखिर कैसे किसान केंद्र सरकार पर भरोसा कर ले? बनारस से सटे खालिसपुर गांव के किसान उमेश चौबे बड़े कड़क अंदाज में सवाल उठा रहा हैं। उमेश दूबे कहते हैं कि गांव में घूमते आवारा पशुओं ने न केवल पशुधन को खराब किया, दूध से होने वाले आमदनी पर असर डाला बल्कि इसके चलते हर किसान को बड़ा खेती का नुकसान भी हो रहा है। कई अनाज न तो बो पा रहे हैं और न ही खाली खेत देखे जाते हैं। ऊपर से आज नीम कोटेड यूरिया तो आसानी से मिल रही है, लेकिन डाई, पोटाश समेत दूसरी खाद 30-40 फीसदी मंहगी है।
उमेश के इस सवाल से किसान नेता चौधरी पुष्पेन्द्र सिंह सहमत हैं। पुष्पेन्द्र सिंह कहते हैं कि केन्द्र सरकार की किसान नीति जितना समस्या सुलझा रही है, उससे ज्यादा किसानी को उलझा दे रही है। हालत यह है कि आज डीजल का मूल्य आसमान छू रहा है, कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत 40 डॉलर प्रति बैरल से कम है। सरकार यह भी नहीं सोचती कि किसान डीजल से अपने खेत में पानी भरने का इंजन चलाता है। उसका ट्रैक्टर, हारवेस्टर चलता है और उसके भी घर में अब दोपहिया वाहन हैं। उत्तर प्रदेश में किसानों को बिजली का मूल्य भी तीन गुना चुकाना पड़ रहा है। ऊपर से डाई, पोटाश समेत दूसरी खाद काफी मंहगी हो चुकी हैं। चौधरी पुष्पेन्द्र सिंह कहते हैं कि मुझे तो कई बार समझ में नहीं आता कि किसान की वास्तविक लागत कितना बढ़ गई और इसके अनुपात में उसकी आमदनी कितनी घट गई है।
एमएसपी पर सरकार खाद्यान्न बिकवाने की ही गारंटी ले ले
केन्द्र सरकार ने सामान्य धान का समर्थन मूल्य 1800 रुपये प्रति क्विंटल तय कर रखा है। चौधरी पुष्पेन्द्र सिंह कहते हैं कि पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सामान्य धान 500 रुपये प्रति क्विंटल कम पर और बासमती 1000 रुपये के कम मूल्य पर बिका है। यही हाल देश की दूसरी मंडियों का भी है। आढ़तियों या निजी व्यापारियों ने एमएसपी से 500-1000 रुपये कम धान खरीदा। पंजाब और हरियाणा के किसानों को इसकी और बड़ी समस्या झेलनी पड़ी होगी। इसलिए वे प्रदर्शन कर रहे हैं। चौधरी पुष्पेन्द्र सिंह का कहना है कि मेरी तो केन्द्र सरकार से मांग है कि वह चाहे खुद खाद्यान्न खरीदे या निजी कंपनियों व्यापारियों से खरीदवाए, लेकिन न्यूनतम समर्थन मूल्य या इससे ऊपर की दर पर खरीदने की बाध्यता सुनिश्चित करे। ऐसा नहीं होता तो मेहनत के बाद किसान के पास लुटने, पिटने के सिवा कोई चारा नहीं होगा।
छुट्टा पशुओं से खेती पर पड़ा असर भी जान लें
पशुधन किसान की एक तिहाई आमदनी का जरिया है। चौधरी बताते हैं कि किसान को नई गाय लेनी होती है तो वह पुरानी गाय को बेचकर कुछ पैसे जोड़कर नई गाय ले आता है। गाय दूध देती है और एक वक्त का दूध वह बेचता है, दूसरे वक्त का घर के इस्तेमाल में लाता है। इससे उसे बड़ी राहत मिल जाती है। अब पुरानी गाड़ी, टूटी साइकिल, लोहे लक्कड़ का भाव तो मिल जाता है, लेकिन पुरानी गाय, उसका बछड़ा कोई नहीं लेता। यह सीधा नुकसान है। दूसरा बड़ा नुकसान उत्तर प्रदेश के हर गांव में आवारा पशु फसल खा जाते हैं। चौधरी पुष्पेन्द्र सिंह कहते हैं कि खूंट पर बंधी गाय साल भर में 75-80 हजार का भूसा, चारा खाती है। वहीं आवारा पशु करीब एक लाख रुपये की फसल को नुकसान पहुंचाता है। वह कुछ पेट भर खाता है और खाने के चक्कर में इसका तीन गुना खराब कर देता है। खाता भी है तो फसल का मुख्य हिस्सा (जैसे, अनाज की बाली, फूल, फुनगी, ऊपर का क्रीमी हिस्सा)। किसान इस स्थिति से बचने के लिए दूसरी फसल बोता है तो उसे उसकी उपज का दाम मिलने में समस्या आ रही है। इस तरह से देश में करीब एक लाख करोड़ का नुकसान तो केवल आवारा पशु कर रहे हैं। इसे किसान के सिवा कौन झेलता है?
खाद के दाम 30-40 गुना बढ़े
मृदा हेल्थ तो बहुत अच्छी चीज है। खेती खलिहानी में निपुण अंबेदकर नगर के मोती सिंह कहते हैं कि खेत में नाइट्रोजन, पोटाश, फास्फोरस समेत अन्य का समुचित अनुपात होना चाहिए। चौधरी पुष्पेन्द्र सिंह का कहना है कि उन्हें मानने में संकोच नहीं है कि किसानों द्वारा यूरिया के अधिक प्रयोग से इसका अनुपात गड़बड़ाया है। लेकिन किसान भी करे तो क्या करे? नीम कोटेड यूरिया उसे कम दाम पर मिल जाती है, वहीं दूसरी खाद का दाम पिछले छह साल में 30-40 गुना बढ़ चुका है। इसके सामान्तर किसान की उपज में बढ़ोतरी नहीं हुई। ऊपर से बिजली का बिल बढ़ चुका है और अन्य खर्चे काफी बढ़ गए हैं। इसलिए वह धड़ल्ले से यूरिया का पहले की तरह इस्तेमाल कर रहा है। फसल बीमा योजना की भी यही स्थिति है। अब किसानों में इसके प्रति तेजी से दिलचस्पी घटी है। कारण साफ है कि किसानों को लाभ नहीं नजर आ रहा है। वहीं बीमा कंपनियों का मुनाफा बढ़ रहा है। हालांकि केन्द्र सरकार ने एक राहत दे दी है। पहले जिसका किसान क्रेडिट कार्ड बनता था, उसमें से फसल बीमा का प्रीमियम कट जाता था। अब इसमें कुछ सुधार हुआ है और किसानों को थोड़ा राहत मिली है।
क्या 2022 तक किसान की आमदनी दोगुनी होगी?
किसान नेताओं और खेती, खलिहानी के जानकारों को इसमें संदेह है। चौधरी पुष्पेन्द्र सिंह केन्द्र सरकार के एक कदम की तारीफ करते हैं। वह कहते हैं कि केन्द्र सरकार ने किसानों को छह हजार रुपये सालाना देने का निर्णय लेकर अच्छा काम किया है, लेकिन यह राशि बहुत कम है। यह कम से कम 24 हजार रुपये सालाना होनी चाहिए। रहा सवाल लागत घटने, आमदनी बढ़ने और अच्छी कीमत मिलने का, तो किसानों की वास्तविक लागत (सी-2) को तो सरकार ने माना ही नहीं है। सरकार तो यहां (रए-2+एफएल) को लेकर चल रही है। यह उसके मूल लागत से काफी कम है। इसलिए लागत को लेकर ही बड़ा विरोधाभास है। दूसरे किसान की आमदनी कहां से होगी? उसे न तो सस्ती खाद मिल रही है, न बिजली, पानी, डीजल। मंडी तक खाद्यान्न या ऊपज ले जाने से लेकर खाद, अनाज के बीच, ट्रैक्टर, हारवेस्टर, पानी के इंजन पर उसे काफी अधिक खर्च करना पड़ रहा है। इसलिए मुझे ऐसा हो पाने में संदेह नजर आ रहा है। यहां किसान के छले जाने की ही गुंजाइश ज्यादा है।

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