
शेरो-सुख़न की दुनिया में हर जज़्बात को बहुत ख़ूबसूरती के साथ काग़ज़ पर उकेरा गया है. बात चाहे इश्क़ो-मुहब्बत (Love) की हो या समाज के किसी और मसले पर बात की गई हो. शायरी में हर बात को ख़ूबसूरती के साथ बयान किया गया है. आज हम शायरों के इसी बेशक़ीमती कलाम से चंद अशआर आपके लिए 'रेख़्ता' के साभार से लेकर हाजि़र हुए हैं. शायरों के ऐसे अशआर जिसमें बात 'दिल' की हो और दिल तक गई हो. तो आप भी इसका लुत़्फ़ उठाइए...
उल्फ़त में बराबर है वफ़ा हो कि जफ़ा हो
हर बात में लज़्ज़त है अगर दिल में मज़ा हो
अमीर मीनाई
दिल की वीरानी का क्या मज़कूर है
ये नगर सौ मर्तबा लूटा गया
मीर तक़ी मीर
दुनिया की महफ़िलों से उकता गया हूं या रब
क्या लुत्फ़ अंजुमन का जब दिल ही बुझ गया हो
अल्लामा इक़बाल
दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है
लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
तुम्हारा दिल मेरे दिल के बराबर हो नहीं सकता
वो शीशा हो नहीं सकता ये पत्थर हो नहीं सकता
दाग़ देहलवी
आप पहलू में जो बैठें तो सँभल कर बैठें
दिल-ए-बेताब को आदत है मचल जाने की
जलील मानिकपूरी
हम ने सीने से लगाया दिल न अपना बन सका
मुस्कुरा कर तुम ने देखा दिल तुम्हारा हो गया
जिगर मुरादाबादी
ज़िंदगी किस तरह बसर होगी
दिल नहीं लग रहा मोहब्बत में
जौन एलिया
दिल भी पागल है कि उस शख़्स से वाबस्ता है
जो किसी और का होने दे न अपना रक्खे
अहमद फ़राज़
बुत-ख़ाना तोड़ डालिए मस्जिद को ढाइए
दिल को न तोड़िए ये ख़ुदा का मक़ाम है
हैदर अली आतिश
मैं हूंं दिल है तन्हाई है
तुम भी होते अच्छा होता
फ़िराक़ गोरखपुरी
आप दौलत के तराज़ू में दिलों को तौलें
हम मोहब्बत से मुहब्बत का सिला देते हैं
साहिर लुधियानवी
कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें
इतनी जगह कहां है दिल-ए-दाग़-दार में
बहादुर शाह ज़फ़र
उल्फ़त में बराबर है वफ़ा हो कि जफ़ा हो
हर बात में लज़्ज़त है अगर दिल में मज़ा हो
अमीर मीनाई
दिल की वीरानी का क्या मज़कूर है
ये नगर सौ मर्तबा लूटा गया
मीर तक़ी मीर
दुनिया की महफ़िलों से उकता गया हूं या रब
क्या लुत्फ़ अंजुमन का जब दिल ही बुझ गया हो
अल्लामा इक़बाल
दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है
लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
तुम्हारा दिल मेरे दिल के बराबर हो नहीं सकता
वो शीशा हो नहीं सकता ये पत्थर हो नहीं सकता
दाग़ देहलवी
आप पहलू में जो बैठें तो सँभल कर बैठें
दिल-ए-बेताब को आदत है मचल जाने की
जलील मानिकपूरी
हम ने सीने से लगाया दिल न अपना बन सका
मुस्कुरा कर तुम ने देखा दिल तुम्हारा हो गया
जिगर मुरादाबादी
ज़िंदगी किस तरह बसर होगी
दिल नहीं लग रहा मोहब्बत में
जौन एलिया
दिल भी पागल है कि उस शख़्स से वाबस्ता है
जो किसी और का होने दे न अपना रक्खे
अहमद फ़राज़
बुत-ख़ाना तोड़ डालिए मस्जिद को ढाइए
दिल को न तोड़िए ये ख़ुदा का मक़ाम है
हैदर अली आतिश
मैं हूंं दिल है तन्हाई है
तुम भी होते अच्छा होता
फ़िराक़ गोरखपुरी
आप दौलत के तराज़ू में दिलों को तौलें
हम मोहब्बत से मुहब्बत का सिला देते हैं
साहिर लुधियानवी
कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें
इतनी जगह कहां है दिल-ए-दाग़-दार में
बहादुर शाह ज़फ़र
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