देवता तुल्य माने जाने वाले मथुरा की गोवर्धन पर्वत की जाने कुछ अजीब किस्से।

मथुरा की गोवर्धन पर्वत को लोग दूर-दूर से परिक्रमा लगाने आते हैं यह परिक्रमा करीब 22 किलोमीटर लंबी है लोग इसे पैदल चलकर परिक्रमा पूर्ण करते हैं।

यह वही पर्वत है जिसे भगवान श्री कृष्ण ने अपनी कनिष्ठा उंगली पर उठाकर मथुरा वाले लोगों की रक्षा की थी जब एक बार देवता इंद्र ने बहुत तेज बारिश कर कर बता कर लोगों को संकट में डाल दिया था तब भगवान श्री कृष्ण ने इस पर्वत को अपनी कनिष्ठा उंगली पर उठाकर लोगों की रक्षा की थी।

इसके अलावा एक और कहानी प्रचलित है इस पर्वत को लेकर एक बार ऋषि पुलस्त्य इस पर्वत खूबसूरती से बेहद प्रभावित हुए वे इसे अपने साथ ले जाना चाहते थे तभी उस पर्वत ने उस ऋषि मुनि से कहा कि आप बेशक मुझे अपने साथ ले जाइए लेकिन आप मुझे पहली बार जहां पर भी रखेंगे वहीं पर स्थापित हो जाऊंगा तभी ऋषि मुनि उसे अपने साथ लेकर आगे चल पड़े।

कुछ समय बाद ऋषि मुनि की साधना का समय हो गया और वह उस पर्वत को रखकर साधना करने लगे लेकिन वह पर्वत वहीं पर स्थापित हो गया बाद में वह पर्वत को हिलाने लगे तो उनसे हिला भी नहीं इस बात से क्रोधित होकर उस ऋषि मुनि ने इस पर्वत को शाप दे दिया कि तू अपना आकार प्रतिदिन होता रहेगा अभी से मान्यता है कि यह गोवर्धन पर्वत प्रतिदिन मुट्ठी भर छोटा होता जाता है।

मथुरा की गोवर्धन पर्वत को लोग दूर-दूर से परिक्रमा लगाने आते हैं यह परिक्रमा करीब 22 किलोमीटर लंबी है लोग इसे पैदल चलकर परिक्रमा पूर्ण करते हैं।

यह वही पर्वत है जिसे भगवान श्री कृष्ण ने अपनी कनिष्ठा उंगली पर उठाकर मथुरा वाले लोगों की रक्षा की थी जब एक बार देवता इंद्र ने बहुत तेज बारिश कर कर बता कर लोगों को संकट में डाल दिया था तब भगवान श्री कृष्ण ने इस पर्वत को अपनी कनिष्ठा उंगली पर उठाकर लोगों की रक्षा की थी।

इसके अलावा एक और कहानी प्रचलित है इस पर्वत को लेकर एक बार ऋषि पुलस्त्य इस पर्वत खूबसूरती से बेहद प्रभावित हुए वे इसे अपने साथ ले जाना चाहते थे तभी उस पर्वत ने उस ऋषि मुनि से कहा कि आप बेशक मुझे अपने साथ ले जाइए लेकिन आप मुझे पहली बार जहां पर भी रखेंगे वहीं पर स्थापित हो जाऊंगा तभी ऋषि मुनि उसे अपने साथ लेकर आगे चल पड़े।

कुछ समय बाद ऋषि मुनि की साधना का समय हो गया और वह उस पर्वत को रखकर साधना करने लगे लेकिन वह पर्वत वहीं पर स्थापित हो गया बाद में वह पर्वत को हिलाने लगे तो उनसे हिला भी नहीं इस बात से क्रोधित होकर उस ऋषि मुनि ने इस पर्वत को शाप दे दिया कि तू अपना आकार प्रतिदिन होता रहेगा अभी से मान्यता है कि यह गोवर्धन पर्वत प्रतिदिन मुट्ठी भर छोटा होता जाता है।
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