
सैयद इश्तियाक अहमद जाफरी ऊर्फ जगदीप ने चार सौ से ज्यादा फिल्मों में काम किया। फिल्म 'भाभी' और 'बरखा' में बतौर हीरो काम किया। हालांकि पहचान कॉमिक किरदारों ने दी। फिल्म 'शोले' में सूरमा भोपाली की छोटी सी भूमिका ने उन्हें शोहरत दी। उनका भोपाली अंदाज में बोला गया डायलॉग 'हमारा नाम भी सूरमा भोपाली ऐसे ही नहीं है' यादगार है।
जगदीप को सूरमा भोपाली बनाने में 'शोले' के सिनेमेटोग्राफर द्वारका दिवेचा का भी अहम योगदान रहा है। वरना जगदीप इस रोल को छोडऩे का मन बना चुके थे।मामला यूं है कि फिल्म के लेखक जावेद अख्तर ने उन्हें एक टेप दिया था, जिसमें बताया था कि उन्हें कैसे डायलॉग को बोलना है। एक दिन अचानक से उन्हें शूटिंग के लिए बेंगलुरु बुलाया गया। उन्हें होटल में आराम करने को कहा गया।
उस समय निर्देशक रमेश सिप्पी अन्य कलाकारों के साथ शूटिंग में व्यस्त थे। होटल में रहकर बोर रहे जगदीप ने प्रोडक्शन मैनेजर से एक हजार रुपये मांगे ताकि वह रेस में लगा सकें। मैनेजर ने मना कर दिया। इस बात से नाराज जगदीप ने अपना सामान बांधकर मुंबई वापस आने का फैसला कर लिया।
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